स्थान: महाकाल वन क्षेत्र, उज्जैन


📜 श्लोक:

वतस्ता तीरे रम्ये पांडवो ब्राह्मणोऽभवत्।
यस्य तपः प्रभावेन हर्षो जातः शिवप्रियः॥

श्लोक का अर्थ:
वतस्ता नदी के तट पर रहने वाले ब्राह्मण पांडव की कठोर तपस्या से उत्पन्न बालक हर्ष, भगवान शिव को प्रिय हुआ। उस बालक ने शिव की कृपा से चिरायु होने का वरदान पाया।


📖 कथा: पुत्र की आयु को लेकर पिता की चिंता और बालक की दृढ़ तपस्या

प्राचीन समय की बात है। वतस्ता नदी के किनारे पांडव नामक एक ब्राह्मण निवास करता था। वह शीलवान, धार्मिक और तपस्वी था। लेकिन समाज के जातिवादी नियमों और पत्नी के त्याग के कारण उसे एकाकी जीवन व्यतीत करना पड़ा।

उसके पास केवल एक प्रिय वस्तु थी — “प्रेमधारिणी” नामक एक पवित्र ग्रंथ या कथा। अपने कष्टों से ऊपर उठने के लिए उसने एक गुफा में भगवान शिव की तपस्या प्रारंभ की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान रुद्र प्रकट हुए और उसे एक तेजस्वी पुत्र का वरदान दिया।


👶 यज्ञोपवीत और ऋषियों की चुप्पी

पुत्र जन्म के पश्चात ब्राह्मण ने बड़े हर्ष के साथ ऋषियों की उपस्थिति में यज्ञोपवीत संस्कार कराया। संस्कार के अंत में उसने ऋषियों से आशीर्वाद माँगा — “मेरे पुत्र को दीर्घायु होने का आशीर्वाद दें।”

परंतु ऋषि बिना कुछ बोले वहाँ से चले गए

ब्राह्मण पांडव का हृदय भर आया। उसने रोते हुए कहा —

“जिस पुत्र को स्वयं भगवान शिव ने मुझे दिया है, वह अल्पायु कैसे हो सकता है? क्या शिव का वरदान व्यर्थ जाएगा?”


🧒 हर्षवर्धन का संकल्प

पिता का विलाप देखकर बालक हर्षवर्धन का हृदय द्रवित हो गया। उसने दृढ़ निश्चय किया:

“मैं महेश्वर रुद्र का पूजन करूँगा, उनसे चिरायु होने का वर प्राप्त करूँगा और यमराज पर विजय प्राप्त करूँगा।”


🙏 महाकाल वन की तपस्या

हर्षवर्धन अकेले ही महाकाल वन आया और एक दिव्य शिवलिंग के सामने कठोर तपस्या करने लगा। उसकी तप और भक्ति से भगवान रुद्र प्रसन्न हुए।

उन्होंने वरदान दिया:

“हे वत्स! तुम चिरंजीवी होओ। मृत्यु का भय तुमसे दूर रहे। अंतकाल में तुम मेरे गण बनोगे।”


🕉️ कंठडेश्वर लिंग की प्रतिष्ठा

जिस शिवलिंग के सामने हर्षवर्धन ने तप किया, वह शिवलिंग “कंठडेश्वर” के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

“कंठ” का अर्थ है “गला” — संभवतः यह नाम भगवान रुद्र के नीलकंठ रूप से भी जुड़ा हो।


🌟 मान्यता और दर्शन का फल

  • कंठडेश्वर महादेव के दर्शन और पूजन से चिरायु का वरदान मिलता है
  • मृत्यु का भय, अकाल मृत्यु और रोग-शोक दूर होते हैं
  • भगवान शिव के गणत्व की प्राप्ति होती है
  • विशेषकर बालकों के दीर्घायु और सुरक्षा हेतु इस मंदिर में पूजन शुभ माना जाता है

📍 मंदिर की स्थिति

श्री कंठडेश्वर महादेव मंदिर
स्थान: महाकाल वन क्षेत्र, उज्जैन
निकटवर्ती स्थल: महाकालेश्वर मंदिर से कुछ ही दूरी पर, पैदल जाकर दर्शन किए जा सकते हैं


📅 विशेष पूजन मुहूर्त:

  • श्रावण मास के सोमवार
  • रुद्राभिषेक के लिए बालकों की लंबी उम्र हेतु पूजन
  • महाशिवरात्रि
  • यज्ञोपवीत संस्कार के समय विशेष पूजन

❓FAQs – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Q. क्या कंठडेश्वर महादेव के दर्शन से अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है?
A. हां, मान्यता है कि इस लिंग की पूजा करने से मृत्यु के दोषों का नाश होता है और आयु में वृद्धि होती है।

Q. क्या बालकों के लिए इस मंदिर में विशेष पूजा की जाती है?
A. जी हां, दीर्घायु एवं रक्षा हेतु अभिभावक विशेष रूप से इस मंदिर में रुद्राभिषेक और महामृत्युंजय जाप कराते हैं।

Q. क्या यह मंदिर उज्जैन के मुख्य 84 महादेवों में से एक है?
A. हां, श्री कंठडेश्वर महादेव 84 महादेव श्रृंखला के क्रमांक 34 पर आते हैं।


84 महादेव : श्री कंथडेश्वर महादेव(34)
84 महादेव : श्री कंठडेश्वर महादेव(34)

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