स्थान: इंद्रेश्वर महादेव के पश्चिम में, महाकाल वन, उज्जैन
📜 श्लोक:
“आनंदनयतः प्राप्तसिद्धिर्देवी सुदुलर्भा।
अतो नाम सुविख्यात मानन्देश्वरमीक्ष्यताम्॥”
श्लोक का अर्थ:
हे देवी! आनंद नामक तेजस्वी बालक की तपस्या से जो दुर्लभ सिद्धि प्राप्त हुई, उसी कारण यह लिंग “आनंदेश्वर” के नाम से विख्यात हुआ है। इस लिंग के दर्शन से सांसारिक मोह, जन्ममरण का चक्र और स्वार्थजन्य भ्रम मिट जाते हैं।
🧘♂️ पौराणिक कथा: मोह, विवेक और तपस्या की अद्भुत गाथा
👑 राजा अनमित्र और रानी गिरिभद्रा का तेजस्वी पुत्र
प्राचीन काल में अनमित्र नामक एक धर्मात्मा, तेजस्वी और पराक्रमी राजा हुए। उनकी पत्नी गिरिभद्रा सौंदर्य में अद्वितीय और राजा की अत्यंत प्रिय रानी थीं। एक समय उन्हें एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जिसका नाम रखा गया — आनंद।
जन्म लेते ही बालक ने हँसना शुरू कर दिया। माता गिरिभद्रा ने उससे हँसने का कारण पूछा तो बालक ने अद्भुत उत्तर दिया:
“मुझे पूर्वजन्म का ज्ञान है। इस सृष्टि में हर कोई स्वार्थी है। आप भी मुझसे कुछ अपेक्षा रखती हैं, एक राक्षसी मुझे उठाकर ले जाना चाहती है… मैं इसे जानता हूँ।”
यह सुन माता आश्चर्यचकित होकर क्रोधित हो सूतिका गृह से बाहर निकल गई। उसी अवसर का लाभ उठाकर एक बिल्ली रूपी राक्षसी बालक आनंद को वहाँ से उठा ले गई और उसे राजा विक्रांत की रानी हैमिनी के शयनगृह में रख आई।
👶 बालकों की अदल-बदल: कर्म की अद्भुत लीला
राजा विक्रांत ने उस बालक को अपना पुत्र मानकर उसका नाम भी आनंद ही रखा। उधर राक्षसी ने विक्रांत के असली पुत्र को एक ब्राह्मण बोध के घर छोड़ दिया, जिसने उसका नाम रखा — चैत्ररथ।
समय बीतता गया। जब राजा विक्रांत ने आनंद का उपनयन संस्कार (यज्ञोपवीत) कराया, तब गुरु ने आनंद को अपनी माता को प्रणाम करने को कहा।
आनंद का उत्तर सबको चौंकाने वाला था:
“मैं किस माता को प्रणाम करूं? जन्म देने वाली को या पालन करने वाली को?”
यह सुन सभी आश्चर्य में पड़ गए। आनंद ने अपनी पूर्वजन्म की स्मृति और सत्य घटना सबको विस्तार से बताई — बालकों की अदलाबदली, राक्षसी की चाल और वास्तविकता।
🌿 मोह का त्याग और तपस्या की ओर
आनंद ने कहा:
“इस संसार में मोह ही सभी दुखों की जड़ है। मैं मोह माया त्याग कर तपस्या करूंगा। आप कृपया अपने असली पुत्र चैत्र को स्वीकारें।”
राजा विक्रांत ने ब्राह्मण बोध से चैत्र को वापस मंगाया और राज्य का उत्तराधिकारी बना दिया। आनंद को उन्होंने ससम्मान विदा किया।
🕉️ शिव आराधना और वरदान
आनंद तपस्या हेतु महाकाल वन गया। वहाँ उसने इंद्रेश्वर महादेव के पश्चिम में स्थित एक दिव्य लिंग की घोर तपस्या की। भगवान शिव आनंद की भक्ति से प्रसन्न हुए और वरदान दिया:
“हे आनंद! तुम छठे मनु के रूप में जन्म लेकर यशस्वी होगे। तुम्हारा नाम युगों तक प्रसिद्ध रहेगा।”
चूंकि यह लिंग आनंद की तपस्या से प्रतिष्ठित हुआ, इसलिए वह आनंदेश्वर कहलाया।
🌟 दर्शन लाभ
- जन्म-जन्मांतर के कर्म दोष समाप्त होते हैं
- मोह माया से मुक्ति प्राप्त होती है
- पूर्व जन्म के ज्ञान का जागरण होता है
- कठिन तप और विवेक की प्रेरणा मिलती है
- आध्यात्मिक जागृति और मन की स्थिरता प्राप्त होती है
📍 मंदिर की स्थिति
श्री आनंदेश्वर महादेव मंदिर
स्थान: इंद्रेश्वर महादेव के पश्चिम दिशा में, महाकाल वन क्षेत्र, उज्जैन
पहुँचने का मार्ग: उज्जैन रेलवे स्टेशन से लगभग 3-4 किमी की दूरी पर, ऑटो / टैक्सी द्वारा पहुँचा जा सकता है।
📅 विशेष अवसर:
- श्रावण सोमवार
- महाशिवरात्रि
- गुरुपूर्णिमा
- चैत्र नवरात्रि (तप, विवेक और ध्यान हेतु)
❓FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
Q. श्री आनंदेश्वर महादेव के दर्शन का क्या फल है?
A. मोह माया का नाश होता है, तप और आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है, कर्म बंधनों से मुक्ति मिलती है।
Q. इस मंदिर की स्थापना किसने की थी?
A. आनंद नामक तेजस्वी बालक ने अपनी घोर तपस्या से इस लिंग की स्थापना की थी।
Q. क्या यहां शिवजी साक्षात प्रकट हुए थे?
A. हाँ, आनंद की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए और वरदान दिया।

84 महादेव : श्री आनंदेश्वर महादेव (33)
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